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श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते!

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“श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते!”             इस उपन्यास की रचना गुजराती साहित्यकार श्री दिनकर जोशी जी ने मूलतः गुजराती में किया है जिसका बाद में हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया है विद्या विहार प्रकाशन ने। पुस्तक की विषयवस्तु महाभारत अंत के ३६ वर्ष उपरांत द्वारका नगरी में व्याप्त अराजकता है और गांधारी के श्राप के फलस्वरूप कैसे यादव कुल में विध्वंस मचा हुआ है। यादव कुल की आपसी लड़ाई और मद्यपान को लेकर कृष्ण व्यथित हैं और इसी क्रम में वन में उन्हें ज़रा का बाण लग जाता है। ज़रा को जब ज्ञात होता है की भूलवस बाण कृष्ण को लग गया तो वह क्षमा याचना करने लगा। श्री कृष्ण उसे संबोधित करते हुए कहते हैं, “पाप आचरण नहीं, भावना है ! आचरण कर्मप्रेरित निमित्त है - भावना ही आत्म प्रेरित है। तू भावना मुक्त है, वत्स । तुझे पाप स्पर्श नहीं करेगा..”         जैसे ही अर्जुन को यह ज्ञात होता है यादव कुल में कलह है वो कृष्ण से मिलने द्वारका और फिर प्रभास जाते हैं। वन में कृष्ण से भेंट और उनके आदेशानुसार कर्म करके जब अर्जुन महल लौटते हैं और कृष्ण के ...